विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में चित्रगुप्त के लेखे की व्यापकता अत्यंत विस्तार से बताई गई है। वे जीव के जीवन का प्रत्येक कर्म देखते और लिखते हैं।
गुप्त कर्म — जो कर्म व्यक्ति ने अकेले में, छुपकर किए — चाहे चोरी हो, झूठ हो, छल हो — सब दर्ज होते हैं। 'चित्रगुप्त' नाम ही यह बताता है कि छिपे हुए कर्म भी उन्हें दिखते हैं।
मनसा-वाचा-कर्मणा — केवल कर्म नहीं, मन के विचार (मनसा), वाणी (वाचा) और शारीरिक कृत्य (कर्मणा) — तीनों का लेखा होता है। जो सोचा पर किया नहीं, वह भी कुछ हद तक लेखे में आता है।
पुण्यकर्म — दान, सेवा, सत्यवादिता, माता-पिता की सेवा, भक्ति, व्रत, तीर्थ — सभी पुण्यों का भी लेखा रहता है।
पापकर्म — झूठ, चोरी, हिंसा, व्यभिचार, द्रोह, अहंकार, असत्य साक्ष्य — हर पाप अलग-अलग दर्ज होता है।
आजीवन — जन्म से मृत्यु तक का हर क्षण लेखे में है। एक भी कर्म छूटता नहीं। इसीलिए कहा जाता है — 'चित्रगुप्त के सामने तिल-तिल का हिसाब होता है।'



