विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण और शास्त्रीय ग्रंथों में दान के फल घटने के कारणों का उल्लेख मिलता है।
अहंकार और प्रचार — जो दान दिखावे के लिए, यश के लिए किया जाए — वह राजसिक दान है। गीता में कहा गया है — जो दान अहंकार के साथ दिया जाए उसका फल सीमित होता है।
अपात्र को दान — जो अयोग्य, अधर्मी और कृतघ्न व्यक्ति को दिया जाए वह तामसिक दान है — इसका फल या तो नहीं मिलता या विपरीत मिलता है।
पछतावा — दान देने के बाद पछताना — 'वापस लेना' — दान का फल नष्ट कर देता है।
प्रतिफल की आशा — जो दान बदले में कुछ पाने की आशा से दिया जाए वह राजसिक है — इसका फल संकुचित होता है।
दान के बाद गर्व — दान करने के बाद दान का बखान करना फल को कम करता है।
गरुड़ पुराण का आदर्श — 'सात्विक दान' — बिना स्वार्थ, बिना अहंकार, उचित पात्र को, उचित समय पर दिया गया दान — यही अक्षय फल देता है।





