विस्तृत उत्तर
एक बार प्रजापति दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने अहंकारवश भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया। शिव के स्पष्ट मना करने पर भी, माता सती अपने पिता के यज्ञ में चली गईं। वहाँ दक्ष ने सती के सम्मुख शिव का घोर अपमान किया।
पति के अपमान से क्षुब्ध होकर और दक्ष के रजोगुणी-तमोगुणी अंश (शरीर) से स्वयं को पूर्णतः मुक्त करने के उद्देश्य से, माता सती ने योगाग्नि में अपना शरीर भस्म कर दिया।
यह प्रसंग यह दार्शनिक संदेश देता है कि जहाँ विशुद्ध चेतना (शिव) का सम्मान नहीं होता, वहाँ ऊर्जा (सती) का अस्तित्व भी समाप्त हो जाता है।





