विस्तृत उत्तर
दक्ष प्रजापति ने अपने यज्ञ में शिवजी और सतीजी को नहीं बुलाया। दक्ष ने अपनी सब पुत्रियों को बुलाया लेकिन शिवजी से वैर के कारण सतीजी को भुला दिया।
शिवजी ने सतीजी को समझाया — 'कहेहु नीक मोरेहुँ मन भावा। यह अनुचित नहिं नेवत पठावा। दच्छ सकल निज सुता बोलाई। हमरें बयर तुम्हउ बिसराई॥'
इसका अर्थ — शिवजीने कहा — तुमने बात तो अच्छी कही, यह मेरे मनको भी पसंद आयी। पर उन्होंने न्योता नहीं भेजा, यह अनुचित है। दक्षने अपनी सब लड़कियोंको बुलाया है; किन्तु हमारे वैरके कारण उन्होंने तुमको भी भुला दिया।
आगे शिवजी ने चेतावनी दी — 'ब्रह्मसभाँ हम सन दुखु माना। तेहि तें अजहुँ करहिं अपमाना। जौं बिनु बोलें जाहु भवानी। रहइ न सीलु सनेहु न कानी॥' — एक बार ब्रह्माकी सभामें दक्ष हमसे अप्रसन्न हो गये थे, उसीसे वे अब भी हमारा अपमान करते हैं। बिना बुलाये जाओगी तो न शील ही रहेगा और न स्नेह-मर्यादा।





