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रामचरितमानस — बालकाण्ड⏱ 2 मिनट पठन

दक्ष यज्ञ में सतीजी का क्या अपमान हुआ?

दक्ष ने सतीजी का कोई आदर नहीं किया और सभा में शिवजी की खुलकर निन्दा की। यज्ञ में शिवजी का कोई भाग नहीं रखा गया।

संक्षिप्त उत्तर

दक्ष ने सतीजी का कोई आदर नहीं किया और सभा में शिवजी की खुलकर निन्दा की। यज्ञ में शिवजी का कोई भाग नहीं रखा गया। सतीजी से यह अपमान सहा नहीं गया और उन्होंने क्रोध में सभा को डाँटा।

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विस्तृत उत्तर

सतीजी जब पिता दक्ष के यज्ञ में पहुँचीं तो उनकी माता ने तो प्रेम से मिलीं, किन्तु दक्ष ने उन्हें देखकर भी कोई आदर नहीं किया। इतना ही नहीं, दक्ष ने पूरी सभा में शिवजी की निन्दा की।

सतीजी ने देखा कि यज्ञ में शिवजी का कोई भाग नहीं रखा गया। जब सतीजी से शिवजी का अपमान सहा नहीं गया, तो उनके हृदय में कोई प्रबोध नहीं हुआ और वे सारी सभा को डाँटकर क्रोधभरे वचन बोलीं।

दोहा — 'सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोध। सकल सभहि हठि हटकि तब बोलीं बचन सक्रोध॥'

इसका अर्थ — उनसे शिवजीका अपमान सहा नहीं गया, हृदयमें कुछ भी प्रबोध नहीं हुआ। तब वे सारी सभाको हठपूर्वक डाँटकर क्रोधभरे वचन बोलीं।

सतीजी ने कहा — 'जगदातमा महेसु पुरारी। जगत जनक सब के हितकारी। पिता मंदमति निंदत तेही। दच्छ सुक्र संभव यह देही॥'

अर्थ — त्रिपुरको मारनेवाले भगवान् महेश्वर सम्पूर्ण जगतके आत्मा हैं, वे जगत्पिता और सबका हित करनेवाले हैं। मेरा मन्दबुद्धि पिता उनकी निन्दा करता है; और मेरा यह शरीर दक्षहीके वीर्यसे उत्पन्न है।

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