विस्तृत उत्तर
सतीजी ने शिवजी की निन्दा सहन नहीं की। उन्होंने सभा को डाँटा और फिर शिवजी को हृदय में धारण करके योगाग्नि से अपना शरीर त्याग दिया।
चौपाई — 'तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतू। उर धरि चंद्रमौलि बृषकेतू। अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। भयउ सकल मख हाहाकारा॥'
इसका अर्थ — इसलिये चन्द्रमाको ललाटपर धारण करनेवाले वृषकेतु शिवजीको हृदयमें धारण करके मैं इस शरीरको तुरन्त ही त्याग दूँगी। ऐसा कहकर सतीजीने योगाग्निमें अपना शरीर भस्म कर डाला। सारी यज्ञशालामें हाहाकार मच गया।
सतीजी ने अन्तिम समय में श्रीरामजी का भी स्मरण किया और प्रार्थना की कि जल्दी से जल्दी यह देह छूट जाय और अगले जन्म में शिवजी के चरणों में प्रेम बना रहे।





