विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में दीपदान का उल्लेख मृत्यु के बाद के अंधकारमय यममार्ग के संदर्भ में विशेष रूप से किया गया है।
यममार्ग में प्रकाश — गरुड़ पुराण में बताया गया है कि तामिस्त्र और अंधकारमय नरकों और यममार्ग के अंधेरे में जीव को दिशा-भ्रम होता है। दीपदान से दाता को यममार्ग में प्रकाश मिलता है।
दशगात्र में दीप — गरुड़ पुराण के ग्यारहवें अध्याय में दशगात्र की विधि में बताया गया है — 'धूप-दीप, नैवेद्य, मुखवास तथा दक्षिणा समर्पित करें।' दीप-दान पिंडदान के साथ अनिवार्य है।
सांयकालीन दीप — अशौच काल में भी प्रेत के निमित्त 'सायंकाल में जल, दुग्ध, माला, दीप आदि प्रदान किए जाते हैं जो घट टांगकर दिए जाते हैं।'
श्राद्ध में दीप — पितृपक्ष और श्राद्ध में पितरों के नाम पर दीप जलाने की परंपरा है। यह दीप पितरों और प्रेत को यममार्ग में मार्गदर्शन करता है।
प्रतीकात्मक अर्थ — दीप ज्ञान का प्रतीक है। जिसने जीवन में ज्ञान का प्रकाश दिया — शिक्षा दी, मार्गदर्शन किया — उसे यममार्ग के अंधकार में प्रकाश मिलता है।
अंधकूप नरक में — जो जीव अंधेरे में भटकते हैं, उनके लिए दीपदान से कुछ राहत मिलती है — यह शास्त्रीय मान्यता है।


