विस्तृत उत्तर
अनेक उत्तर — सब सत्य:
अतिथि सेवा: 'अतिथि देवो भव' (तैत्तिरीय उपनिषद)। अतिथि = भूखा आए तो भोजन = गृहस्थ सबसे बड़ा धर्म।
पत्नी/पति सम्मान: 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः' (मनुस्मृति 3.56) = जहां स्त्री सम्मानित, वहां देवता।
माता-पिता सेवा: 'मातृ देवो भव, पितृ देवो भव' = देवता समान।
संतान पालन: सुसंस्कारित संतान = समाज सेवा।
सार (गीता): 'स्वधर्मे निधनं श्रेयः' (3.35) = अपना कर्तव्य पालन = सबसे बड़ा धर्म। गृहस्थ = परिवार+समाज+ईश्वर = तीनों सेवा।
महाभारत: 'गृहस्थ आश्रम = सबसे बड़ा; बाकी तीनों (ब्रह्मचर्य/वानप्रस्थ/सन्यास) = गृहस्थ पर निर्भर।'





