विस्तृत उत्तर
तैत्तिरीय उपनिषद: *'अतिथिदेवो भव'* — अतिथि = देवता समान।
महत्व: गृहस्थ = पंचमहायज्ञ में 'मनुष्य यज्ञ' = अतिथि सेवा = देव पूजा समान। बिना अतिथि सत्कार = गृहस्थ धर्म अपूर्ण।
विधि: अतिथि आए → पहले जल → आसन → भोजन → विदाई। *'अन्नं न परिचक्षीत'* (अन्न त्यागो मत) — अतिथि भूखा न जाए।
कथा: धर्मराज युधिष्ठिर = अतिथि सत्कार आदर्श। नकुल-नेवला कथा = आधा शरीर सोना (अतिथि सत्कार पुण्य)।
आधुनिक: मेहमान = सम्मान+प्रेम। भारतीय संस्कृति = Hospitality = DNA में। 'पधारो म्हारे देश' = यही भाव।





