विस्तृत उत्तर
श्रीसूक्त के प्रथम मंत्र में ही देवी को 'हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्' कहकर पुकारा गया है, अर्थात् स्वर्ण के समान वर्ण वाली, हरिणी के समान सुशोभित और स्वर्ण-रजत (सोने-चाँदी) की माला धारण करने वाली।
स्वर्ण केवल एक मूल्यवान धातु नहीं है; वैदिक दर्शन में स्वर्ण शुद्धता, अमरता और अक्षय ज्ञान का प्रतीक है। स्वर्ण काल के प्रभाव से कभी मलिन नहीं होता, उसमें जंग नहीं लगता। इसी प्रकार लक्ष्मी का मूल स्वरूप परम शुद्ध है।
रजत् (चाँदी) चंद्रमा की शीतलता और मानसिक शांति का प्रतीक है। अतः स्वर्ण और रजत की माला धारण करने का अर्थ है जीवन में बाहरी ऐश्वर्य (स्वर्ण/सूर्य तत्त्व) और आंतरिक शांति (रजत/चंद्र तत्त्व) का परिपूर्ण संतुलन स्थापित करना।




