विस्तृत उत्तर
सनातन शास्त्रों में कर्मफल की व्यवस्था को बहुत सूक्ष्मता से समझाया गया है। कर्मों का फल तीन प्रकार से मिल सकता है — इसी जीवन में (प्रारब्ध के रूप में), मृत्यु के बाद यमलोक में, और अगले जन्म में।
गरुड़ पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि मनुष्य के कर्मों का पूरा लेखा-जोखा चित्रगुप्त द्वारा रखा जाता है। मृत्यु के बाद यमराज के दरबार में इसका न्याय होता है और जीवात्मा को उसके अनुसार स्वर्ग, नर्क या पुनर्जन्म मिलता है।
भगवद्गीता में कर्मों के तीन भेद बताए गए हैं — संचित (जमा हुए समस्त कर्म), प्रारब्ध (इस जन्म में भोगे जाने वाले कर्म) और क्रियमाण (अभी किए जा रहे नए कर्म)। जो कर्म इस जन्म में पक जाते हैं वे यहीं फल देते हैं, जो नहीं पकते वे अगले जन्म में आते हैं।
इस प्रकार कर्मफल मिलने की कोई एक निश्चित समय-सीमा नहीं है। कुछ कर्मों का फल तत्काल मिलता है, कुछ का देर से — परंतु कोई कर्म बिना फल के नहीं रहता। यही शास्त्रों का अटल वचन है।





