विस्तृत उत्तर
विश्वामित्रजी ने परशुरामजी और लक्ष्मणजी के वाद-विवाद में बीच-बचाव (मध्यस्थता) की भूमिका निभाई। जब लक्ष्मणजी के तीखे वचनों से परशुरामजी अत्यन्त क्रोधित हो रहे थे और स्थिति बिगड़ने लगी, तब विश्वामित्रजी ने बीच में आकर शान्ति स्थापित करने का प्रयास किया।
रामजी ने भी इशारे से लक्ष्मणजी को शान्त किया — 'सयनहिं रघुपति लखनु नेवारे। प्रेम समेत निकट बैठारे' — श्रीरामचन्द्रजीने इशारेसे लक्ष्मणको मना किया और प्रेमसहित अपने पास बैठा लिया।
फिर रामजी ने स्वयं अत्यन्त विनीत, मृदु और शीतल वाणी से परशुरामजी से बात करके उन्हें शान्त किया — यह रामजी की मर्यादा और विनम्रता का प्रमाण है।

