विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में पिंडदान के प्रेत पर होने वाले प्रभावों का अत्यंत विस्तृत और सुंदर वर्णन है।
शरीर-निर्माण — गरुड़ पुराण में कहा गया है कि दस दिनों तक दिए गए पिंडों से प्रेत के सूक्ष्म शरीर के विभिन्न अंगों का निर्माण होता है। 'दग्धे देहे पुनर्देहः पिण्डैरुत्पद्यते' — पिंडों से नई देह उत्पन्न होती है।
भूख-तृप्ति — पिंडदान प्रेत के लिए भोजन का कार्य करता है। भूख-प्यास की तीव्र पीड़ा कम होती है।
यात्रा-शक्ति — तेरहवें दिन का पिंडदान यात्रा की शक्ति देता है। इसके बाद ही जीव यमलोक की दीर्घ यात्रा प्रारंभ कर सकता है।
यमदूतों का व्यवहार — पिंडदान प्राप्त जीव के साथ यमदूत कुछ सौम्य व्यवहार करते हैं।
मुक्ति का मार्ग — शास्त्रोक्त विधि से दशगात्र श्राद्ध और षोडश श्राद्ध करने पर प्रेत-शरीर से मुक्ति मिलती है।
नहीं मिलने पर — 'जिनका पिंडदान नहीं होता, वे कल्पान्त तक प्रेत बनकर निर्जन वन में भ्रमण करते रहते हैं।' — यह गरुड़ पुराण का सीधा वर्णन है।





