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पिंडदान न मिलने पर प्रेत को क्या कष्ट होते हैं?

गरुड़ पुराण के प्रथम अध्याय में पिंडदान न मिलने पर प्रेत के कष्टों का अत्यंत हृदयविदारक वर्णन है।

संक्षिप्त उत्तर

पिंडदान न मिलने पर — प्रेत शरीरहीन और असहाय, भूखा-प्यासा, यमदूतों का कठोर व्यवहार और 'कल्पान्त तक निर्जन वन में दुखी भटकन' — यह गरुड़ पुराण का वचन है।

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विस्तृत उत्तर

गरुड़ पुराण के प्रथम अध्याय में पिंडदान न मिलने पर प्रेत के कष्टों का अत्यंत हृदयविदारक वर्णन है।

शरीर-विहीन अवस्था — गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'दग्धे देहे पुनर्देहः पिण्डैरुत्पद्यते' — पिंडों से ही नई देह बनती है। बिना पिंडदान के प्रेत शरीरहीन और असहाय अवस्था में है। वह न यात्रा कर सकता है, न कष्ट-निवारण पा सकता है।

भूख-प्यास की असहनीय पीड़ा — यममार्ग पर जल और अन्न का अभाव है। पिंडदान न मिलने पर प्रेत को भोजन नहीं मिलता। वह भूखा-प्यासा भटकता रहता है।

दीर्घकालीन भटकन — गरुड़ पुराण में स्पष्ट कहा गया है — 'जिनका पिण्डदान नहीं होता, वे प्रेतरूप में होकर कल्पपर्यन्त निर्जन वन में दु:खी होकर भ्रमण करते रहते हैं।'

यमदूत का कठोर व्यवहार — पिंडदान प्राप्त जीव के साथ यमदूत कुछ सौम्य होते हैं, परंतु पिंडदान-विहीन जीव के साथ वे अत्यंत कठोर व्यवहार करते हैं।

यात्रा असंभव — गरुड़ पुराण के चतुर्थ अध्याय में उल्लेख है — 'पिण्डदान का भोग करने पर भी वे क्षुधा से व्याकुल होकर यममार्ग में जाते हैं।' बिना पिंड के यह स्थिति और भी भयावह है।

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