विस्तृत उत्तर
किसी भी 'अमावस्या' तिथि को, किसी पीपल के पेड़ के नीचे (जहाँ पितरों का वास माना जाता है) एक शिवलिंग स्थापित कर, या किसी प्राचीन शिव मंदिर में, 'शिव-नाग संयुक्त पूजा' संपन्न करें।
इस पूजा को करने के उपरांत, यदि संभव हो, तो 'नारायण बली' या 'त्रिपिंडी श्राद्ध' का अनुष्ठान करना (जो अतृप्त पितरों की शांति के लिए होता है) कालसर्प और पितृदोष, दोनों का एक साथ पूर्ण शमन करता है।





