विस्तृत उत्तर
बाल्यावस्था में मृत्यु होने पर श्राद्ध त्रयोदशी या अमावस्या को करने का विधान बताया गया है।
बाल्यावस्था में मृत्यु का श्राद्ध कब करें को संदर्भ सहित समझें
बाल्यावस्था में मृत्यु का श्राद्ध कब करें का सबसे सीधा सार यह है: त्रयोदशी या अमावस्या को।
लोक जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.
इसी विषय पर 5 संबंधित प्रश्न और 6 विस्तृत लेख भी उपलब्ध हैं। इसलिए इस उत्तर को शुरुआती निष्कर्ष मानें और नीचे दिए गए अगले पन्नों से पूरा संदर्भ जोड़ें।
उत्तर पढ़ते समय यह देखें कि उसमें नियम, अपवाद और व्यवहारिक संदर्भ साफ हैं या नहीं।
लोक श्रेणी के दूसरे प्रश्न इस उत्तर की सीमा और उपयोग दोनों स्पष्ट करते हैं।
यदि विस्तृत विधि या पृष्ठभूमि चाहिए, तो नीचे दिए गए लेख पहले खोलें।
इसी विषय के 5 प्रश्न
विषय की गहराई समझने के लिए इन संबंधित प्रश्नों को भी पढ़ें
गजाच्छाया योग कब बनता है?
हस्त, मघा और त्रयोदशी/अमावस्या संयोग पर।
सूतक के बाद अष्टमी श्राद्ध कब करें?
सूतक बाद उचित उपलब्ध तिथि पर।
पूर्णिमा श्राद्ध छूट जाए तो क्या करें?
अष्टमी, द्वादशी या अमावस्या पर कर सकते हैं।
राक्षसों को निशाचर क्यों कहा जाता है?
राक्षसों की शक्ति रात, विशेषकर अमावस्या में बढ़ती है और वे रात में विचरण करते हैं, इसलिए उन्हें निशाचर कहा जाता है।
तंत्र साधना में काली रात का क्या महत्व है?
अमावस्या = काली शक्ति सर्वोच्च, तामसिक ऊर्जा (उग्र देवी), गोपनीय, मन शून्य (चंद्र अनुपस्थित)। दीपावली = काली+लक्ष्मी। सौम्य = पूर्णिमा। उन्नत — गुरु।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक
