विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के प्रेतकल्प में प्रेत-अवस्था के उत्पन्न होने के अनेक कारण बताए गए हैं।
अकाल मृत्यु — सबसे प्रमुख कारण। दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या, सर्पदंश, जल-अग्नि से मृत्यु — इन सभी में आत्मा अप्राकृतिक रूप से शरीर छोड़ती है। ऐसे में अपनी शेष प्राकृतिक आयु तक प्रेत योनि में रहना पड़ता है।
अपूर्ण इच्छाएँ और मोह — गरुड़ पुराण में कहा गया है कि जो आत्मा परिवार, संपत्ति या संसार से अत्यधिक मोहग्रस्त है, वह मृत्यु के बाद भी आगे नहीं बढ़ पाती।
शास्त्रोक्त संस्कारों का अभाव — जिनका उचित अंतिम संस्कार नहीं हुआ, पिंडदान-श्राद्ध नहीं किया गया — वे भी प्रेत योनि में भटकते हैं।
पापकर्म — गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'जो व्यक्ति दूसरों की संपत्ति हड़प करता है, मित्र से द्रोह करता है, विश्वासघात करता है, परायी स्त्री से व्यभिचार करता है, निर्बल को सताता है — ऐसा व्यक्ति प्रेत योनि में अवश्य जाता है।'
मृत्युकालीन वासनाएँ — जब मृत्यु के समय जीव के मन में क्रोध, लोभ, भय या तीव्र इच्छा हो — वह भी प्रेत-अवस्था का कारण बनती है।





