विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में प्रेत-मुक्ति के विषय में बहुत विस्तृत वर्णन है। प्रेत को मुक्त करने वाले कई साधन और साधक बताए गए हैं।
पुत्र — गरुड़ पुराण में सर्वोच्च भूमिका पुत्र की है। 'पुत्' नरक से उद्धार करने के कारण उसे 'पुत्र' कहा गया है। पुत्र द्वारा किए गए दशगात्र श्राद्ध, षोडश श्राद्ध और सपिंडन विधान से प्रेत मुक्त होता है।
सपिंडन विधान — यह वार्षिक श्राद्ध है जिसमें प्रेत को पितरों की श्रेणी में मिलाया जाता है। गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'जब शास्त्रोक्त विधि से सपिण्डन विधान किया जाता है, तब वह प्रेत-शरीर से मुक्त हो जाता है।'
भगवान विष्णु — गरुड़ पुराण में वर्णित है — 'इस प्रकार जो वृषोत्सर्ग करता है, मैं सदा उसे वर प्रदान करता हूँ और प्रेत को मोक्ष प्रदान करता हूँ।' भगवान विष्णु की कृपा से ही अंतिम मुक्ति होती है।
गया श्राद्ध — गया में पिंडदान करने से पितर और प्रेत दोनों को मुक्ति मिलती है।
नारायण बलि — अकाल मृत्यु वाले प्रेत के लिए नारायण बलि विशेष रूप से की जाती है।
इस प्रकार प्रेत-मुक्ति परिजनों के प्रेमपूर्ण कर्तव्य और भगवान विष्णु की कृपा के संयोग से होती है।





