विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में प्रेत को सहायता करने वाले के विषय में स्पष्ट वर्णन है। यह सहायता कई स्रोतों से आती है।
पुत्र और परिजन — गरुड़ पुराण में पुत्र को 'पुत्' नरक से उबारने वाला कहा गया है। पुत्र द्वारा किया गया पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध प्रेत की सबसे बड़ी सहायता है। पुत्र के अभाव में पत्नी, पुत्री या अन्य परिजन भी यह कर्म कर सकते हैं।
ब्राह्मण — गरुड़ पुराण में ब्राह्मणों को प्रेत की यात्रा में सहायक बताया गया है। विधिपूर्वक किए गए श्राद्ध में ब्राह्मण भोजन कराने से उस अन्न का सार प्रेत तक पहुँचता है।
भगवान विष्णु की भक्ति — गरुड़ पुराण के नवें अध्याय में कहा गया है — 'दान के प्रभाव से देवताओं से पूजित होकर वह जीव स्वर्ग को प्राप्त करता है।' ईश्वर-भक्ति और सत्कर्म प्रेत की मुक्ति में सहायक हैं।
स्वयं का पूर्व-कर्म — जीव ने जीवन में जो दान, पुण्य और भक्ति की — वह भी यममार्ग पर उसकी सहायता करती है। यह सबसे विश्वसनीय सहायता है।
इस प्रकार प्रेत की सहायता बाह्य और आंतरिक दोनों स्रोतों से आती है — परिजनों के कर्तव्य से और स्वयं के पूर्व-जीवन के सत्कर्मों से।





