विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में प्रेत की परिवार से अपेक्षाओं का मार्मिक वर्णन है।
पिंडदान और श्राद्ध — सर्वोपरि अपेक्षा यही है कि परिजन दशगात्र से लेकर वार्षिक श्राद्ध तक सभी कर्म विधिपूर्वक करें। गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'जिनका पिण्डदान नहीं होता, वे कल्पान्त तक निर्जन वन में भ्रमण करते रहते हैं।'
दान और दक्षिणा — प्रेत चाहता है कि उसके नाम पर दान किया जाए — गोदान, वस्त्रदान, अन्नदान — ताकि यमलोक में उसे ये वस्तुएँ प्राप्त हों।
स्मरण और रुदन — गरुड़ पुराण में वर्णन है कि प्रेत-आत्मा 13 दिनों तक परिजनों के पास रहती है और उनके रोने-बिलखने को देखकर स्वयं भी रोती है। वह चाहती है कि परिजन उसे याद करें।
संस्कार की पूर्णता — प्रेत अपने अंतिम संस्कारों की पूर्णता चाहता है — उचित दाह-संस्कार, तर्पण, एकादशाह, षोडश श्राद्ध और सपिंडन।
गरुड़ पुराण का आदेश — 'सत्पुत्र को चाहिए कि अंतकाल में सभी प्रकार का दान दिलाए।' यह परिवार के कर्तव्य और प्रेत की अपेक्षा का एक साथ वर्णन है।





