विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में प्रेत को प्यास लगने का कारण भूख के समान ही वासनाओं और संस्कारों से जुड़ा है।
वासनामय शरीर की प्यास — प्रेत का सूक्ष्म शरीर वासनामय है। इस शरीर में जीवन की सभी इच्छाएँ और वासनाएँ संचित होती हैं — जिनमें जल की कामना भी शामिल है। 'जब आत्मा शरीर को त्यागती है तो उसमें भूख और प्यास का भाव आने लगता है।'
यममार्ग पर जल का अभाव — गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'वहाँ कहीं जल भी नहीं दिखता।' इस अभाव में प्यास की पीड़ा और भी तीव्र होती है।
कर्म-संबंधित प्यास — जिस व्यक्ति ने जीवन में दूसरों को जल से वंचित किया, जलदान नहीं किया — उसे प्रेत-अवस्था में यह प्यास विशेष रूप से कष्टकारी होती है।
तर्पण से राहत — इसीलिए मृत्यु के बाद तर्पण का विधान है। जल और तिल से किया गया तर्पण प्रेत की इस प्यास को कुछ कम करता है।
जलदान का फल — जिसने जीवन में जलदान किया हो — प्याऊ लगाई हो, प्यासों को पानी दिया हो — उसे प्रेत-अवस्था में भी जल की कुछ सुविधा मिलती है।





