विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में प्रेत से पितर बनने की प्रक्रिया एक क्रमबद्ध और समयबद्ध संस्कार-शृंखला है।
प्रथम चरण — दाह-संस्कार से प्रेत-अवस्था प्रारंभ होती है।
द्वितीय चरण — दशगात्र (10 दिन के पिंडदान) से यातना-शरीर का निर्माण — प्रेत यमलोक-यात्रा के लिए सक्षम होता है।
तृतीय चरण — एकादशाह (11वाँ दिन) — शय्यादान, गोदान, वृषोत्सर्ग और अष्टमहादान से यात्रा की शक्ति और दिशा मिलती है।
चतुर्थ चरण — षोडश श्राद्ध (16 श्राद्ध) — मलिनषोडशी, मध्यमषोडशी और उत्तमषोडशी। इनसे प्रेत क्रमशः शुद्ध और तैयार होता जाता है।
पंचम चरण — एक वर्ष तक मासिक श्राद्ध — प्रत्येक माह प्रेत को तृप्ति और शक्ति।
षष्ठ चरण — सपिंडीकरण (एक वर्ष बाद) — यही निर्णायक क्षण है। 'जब शास्त्रोक्त विधि से सपिण्डन विधान किया जाता है, तब वह प्रेत-शरीर से मुक्त हो जाता है।' प्रेत-पिंड पितृ-पिंडों में मिल जाता है — प्रेत 'पितर' बन जाता है।
सप्तम चरण — गया श्राद्ध से अंतिम परम गति। 'गया श्राद्ध करने से पितर भगवान गदाधर की कृपा से परम गति प्राप्त होते हैं।'





