विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के तेरहवें अध्याय 'सपिण्डनादि-सर्वकर्मनिरुपण' में सपिंडीकरण की विस्तृत प्रक्रिया बताई गई है।
सपिंडीकरण का समय — मृत्यु के एक वर्ष बाद। मलमास हो तो 13 महीने बाद।
मुख्य विधि — एक 'प्रेत-पिंड' और तीन 'पितृ-पिंड' (पिता, पितामह, प्रपितामह के) बनाए जाते हैं। फिर प्रेत-पिंड को तीनों पितृ-पिंडों में मिला दिया जाता है — यही 'पिंड-मेलन' है।
गरुड़ पुराण में विधि — तेरहवें अध्याय में कहा गया है — 'ब्राह्मणों को सुस्वादु मिष्टान्नों से भोजन कराएँ और फिर दक्षिणा सहित अन्न एवं जलयुक्त बारह घट प्रदान करें।'
शुद्धि — 'तदनन्तर ब्राह्मण को वर्णक्रम से अपनी शुद्धि हेतु जल, शस्त्र, कोड़े या डंडे का स्पर्श करना चाहिए।'
वस्त्र-परिवर्तन — 'सपिण्डन-श्राद्ध करके क्रिया करते समय पहने गये वस्त्रों का त्याग कर दें। इसके बाद श्वेत वस्त्र को धारण करके शय्यादान करें।'
परिणाम — सपिंडीकरण के बाद प्रेत 'पितर' बन जाता है — प्रेत-अवस्था समाप्त होती है।





