विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में श्राद्ध के अनेक प्रकारों का वर्णन है। प्रमुख वर्गीकरण इस प्रकार है।
षोडश (16) श्राद्ध — गरुड़ पुराण के बारहवें अध्याय में षोडश श्राद्धों का उल्लेख है। ये तीन वर्गों में विभाजित हैं — मलिनषोडशी (मृत्यु के बाद 16 दिनों में), मध्यमषोडशी और उत्तमषोडशी। इन सोलह श्राद्धों का क्रमबद्ध अनुष्ठान करने से प्रेत को सद्गति मिलती है।
प्रमुख प्रकार — नित्य श्राद्ध (प्रतिदिन), नैमित्तिक श्राद्ध (विशेष अवसर पर), काम्य श्राद्ध (किसी कामना से), वृद्धि श्राद्ध/नांदीश्राद्ध (शुभ कार्यों से पहले), पार्वण श्राद्ध (पितृपक्ष में), एकोद्दिष्ट श्राद्ध (एक व्यक्ति के लिए), सापिंडन श्राद्ध (वार्षिक — प्रेत को पितर बनाने के लिए) और गोष्ठी श्राद्ध।
गरुड़ पुराण के बारहवें अध्याय में कहा गया है — 'इस प्रकार वृषोत्सर्ग करके सपिण्डीकरण के पूर्व षोडश श्राद्धों को करना चाहिए।'
सबसे महत्वपूर्ण — सापिंडन श्राद्ध, जो मृत्यु के एक वर्ष बाद होता है और प्रेत को पितर की श्रेणी में लाता है — यह गरुड़ पुराण में सर्वाधिक महत्व का श्राद्ध बताया गया है।





