विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में जब मृत्यु के समय जीवात्मा के शरीर से निकलने का वर्णन किया गया है, तब बताया गया है कि शरीर से 'अंगुष्ठ मात्र' — अर्थात् अंगूठे के बराबर — जीवात्मा निकलती है। यमदूत इसी रूप में उसे पकड़कर यमलोक ले जाते हैं।
कठोपनिषद में भी इस विषय पर प्रकाश डाला गया है जहाँ कहा गया है — 'अंगुष्ठ मात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः' — अर्थात् यह पुरुष (जीवात्मा) अंगूठे के बराबर ज्योति के समान है, जो धुएँ के बिना प्रकाशित होती है।
श्वेताश्वतर उपनिषद में भी जीवात्मा के इस सूक्ष्म आकार का उल्लेख है। यह 'अंगुष्ठ मात्र' का वर्णन आत्मा के भौतिक आयाम का नहीं, बल्कि उस सूक्ष्म रूप का संकेत है जिसमें चेतना शरीर छोड़ते समय प्रकट होती है।
यह महत्वपूर्ण है कि यह केवल प्रतीकात्मक या दार्शनिक वर्णन भी हो सकता है, क्योंकि आत्मा वास्तव में निराकार है। 'अंगुष्ठ मात्र' का संदर्भ उस सूक्ष्म जीवन-ऊर्जा को इंगित करता है जो मृत्यु के समय शरीर से निर्गत होती है और जिसे यमदूत ग्रहण करते हैं।



