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तंत्र शास्त्र📜 तंत्रसार, यंत्र शास्त्र, शाक्त आगम1 मिनट पठन

तांत्रिक साधना में यंत्र का क्या महत्व है?

संक्षिप्त उत्तर

यंत्र = देवता का ज्यामितीय रूप। तंत्रसार: 'मंत्र+तंत्र+यंत्र = देवता प्रतिष्ठित।' महत्व: ऊर्जा केंद्रीकरण, देवता निवास, ध्यान सहायक, स्थायी। मंत्र=ध्वनि + यंत्र=रूप + तंत्र=विधि = पूर्ण।

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विस्तृत उत्तर

यंत्र = देवता शक्ति का ज्यामितीय (geometric) प्रतीक। जैसे मूर्ति = देवता का साकार रूप, वैसे यंत्र = देवता का सूक्ष्म/गणितीय रूप।

महत्व

  1. 1ऊर्जा केंद्रीकरण: यंत्र की ज्यामिति विशिष्ट ऊर्जा पैटर्न बनाती है — ब्रह्मांडीय ऊर्जा केंद्रित।
  2. 2देवता निवास: प्राण प्रतिष्ठित यंत्र = देवता का निवास स्थान।
  3. 3मंत्र + यंत्र = पूर्ण साधना: मंत्र = ध्वनि, यंत्र = रूप, तंत्र = विधि — तीनों मिलकर पूर्ण।
  4. 4ध्यान सहायक: यंत्र पर त्राटक (एकटक दृष्टि) = गहन ध्यान।
  5. 5स्थायी: मूर्ति के विपरीत यंत्र सदा शुद्ध — धातु/स्फटिक पर अंकित।

तंत्रसार: 'मन्त्रे तन्त्रे तथा यन्त्रे देवता एव प्रतिष्ठिता' — मंत्र, तंत्र और यंत्र में देवता प्रतिष्ठित।

प्रमुख यंत्र: श्री यंत्र (ललिता), महामृत्युंजय यंत्र (शिव), काली यंत्र, गणेश यंत्र, सुदर्शन यंत्र, नवग्रह यंत्र।

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शास्त्रीय स्रोत
तंत्रसार, यंत्र शास्त्र, शाक्त आगम
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