विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के द्वितीय अध्याय में वैतरणी नदी में रहने वाले भयावह जीवों का विस्तृत वर्णन मिलता है। भगवान विष्णु गरुड़ को बताते हैं:
सूई के समान मुख वाले कीड़े — वैतरणी नदी में ऐसे असंख्य कीड़े हैं जिनका मुख सूई के समान पैना और तीखा है। ये कीड़े पापी जीव के सूक्ष्म शरीर में चुभते रहते हैं। गरुड़ पुराण में इनका उल्लेख विशेष रूप से किया गया है — 'सूई के समान मुख वाले भयानक कीड़ों से चारों ओर व्याप्त है।'
वज्र के समान चोंच वाले गीध और कौए — नदी के ऊपर और चारों ओर वज्र (लोहे) के समान कठोर चोंच वाले विशाल गीध और कौए मँडराते रहते हैं। ये पापी को ऊपर से नोचते और काटते हैं।
घड़ियाल (ग्राह) — नदी में विशालकाय घड़ियाल हैं जिन्हें 'ग्राह' कहा गया है। वज्रदन्त अर्थात् वज्र के समान दाँतों वाले घड़ियाल पापी जीव को पकड़कर खींचते हैं।
सर्प और बिच्छू — मार्ग में महाविषधर सर्प और बिच्छू भी पापी को डसते हैं।
मांसभक्षी पक्षी — सैकड़ों प्रकार के घोर पक्षी नदी के ऊपर मँडराते हैं और पापी के शरीर को नोचते हैं।
जल और मल-मूत्र में रहने वाले कीड़े — भारतकोश के अनुसार वैतरणी नदी में जल और मल-मूत्र में रहने वाले कीड़े भी पापी को सदा सताते और खाते रहते हैं।




