विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के चतुर्थ अध्याय में स्वयं भगवान विष्णु गरुड़ से कहते हैं कि 'यह वैतरणी नदी कष्ट प्रदान करने वाले सभी प्रमुख नरकों में सर्वाधिक कष्टप्रद है।' इसीलिए यमदूत सबसे बड़े पापियों को विशेष रूप से इस नदी में फेंकते हैं।
वैतरणी नदी की भयावहता अद्वितीय है। यह सौ योजन चौड़ी और अत्यंत गहरी है। इसमें साधारण जल नहीं, बल्कि रक्त, मवाद और मांस का कीचड़ बहता है। इसके तट पर हड्डियों का ढेर लगा रहता है। बड़े-बड़े गिद्ध, वज्र जैसी चोंच वाले कौए और विशालकाय ग्राह (घड़ियाल) इस नदी में भरे रहते हैं। सूई के समान मुँह वाले भयानक कीड़े पापियों को हर ओर से काटते रहते हैं।
जब पापी आत्मा इस नदी के पास आती है तो नदी क्रोधित होकर घड़े में डाले घी की भाँति खौलने लगती है और धूएं के साथ भयानक अट्टहास करती है। पापियों के पास कोई नाव नहीं होती। वे इस भयंकर नदी में बार-बार डूबते और उठते रहते हैं। यमदूत उनकी नाक में लोहे का काँटा फँसाकर घसीटते हुए नदी के ऊपर से ले जाते हैं।
इस नदी से पार होने का एकमात्र उपाय है जीवनकाल में किया गया गौदान। जिस व्यक्ति ने जीते-जी वैतरणी गाय का दान किया होता है, वह गाय यमलोक के मार्ग में प्रकट होती है और पापी उसकी पूँछ पकड़कर इस नदी को सुगमता से पार कर लेता है।
गरुड़ पुराण के अनुसार ब्राह्मण-हत्यारे, सुरापान करने वाले, गोघाती, गर्भपात कराने वाले, स्त्री-हत्यारे और गुरु के धन का हरण करने वाले — ये सभी विशेष रूप से वैतरणी में गिराए जाते हैं। इस नदी की पीड़ा इतनी असह्य है कि पापी यहाँ पहुँचकर भूख-प्यास से व्याकुल होकर रक्त तक पीते हैं। यही कारण है कि इसे सर्वाधिक कष्टप्रद नरक कहा गया है।




