विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में वर्णित 28 प्रमुख नरकों में 'दंदशूक' एक विशेष नरक है। 'दंदशूक' शब्द का अर्थ ही है — डसने वाले, काटने वाले (सर्प आदि)। इस नरक की यातना विशेष रूप से सर्पों के डसने से होती है।
दंदशूक नरक उन लोगों के लिए है जो दूसरों को सताने और पीड़ा देने में आनंद लेते हैं। जो लोग सीधे-साधे, निर्दोष व्यक्तियों को जबरन परेशान करते हैं, उनका जीवन दुर्बित करते हैं — उन्हें इस नरक में भेजा जाता है। गरुड़ पुराण के विवरण के अनुसार ऐसे पापियों को ऐसे कुएँ में डाला जाता है जिसमें अनेक खतरनाक जानवर और सर्प हैं।
इस नरक में पाँच मुख वाले और सात मुख वाले महाविषधर सर्प पापी को बार-बार डसते हैं। उनका विष इतना भीषण होता है कि पापी की पीड़ा असह्य हो जाती है। जैसे पापी ने अपनी जीभ के काटने जैसे वचनों से या अपने अत्याचार की तीखी सुइयों से दूसरों को दुःख दिया था, वैसे ही उसे सर्पदंश भोगना पड़ता है। यह न्याय की प्रतिसाम्यता का सिद्धांत है।
इस नरक से निकलने का उपाय भी गरुड़ पुराण बताता है — जीवन में यदि व्यक्ति सर्पों को दूध पिलाए, उनकी रक्षा करे, नाग-पूजन करे और गारूड़ी विद्या का आश्रय ले, तो वह इस नरक से बच सकता है।
दंदशूक नरक की यातना का एक और पक्ष यह है कि यह नरक नदी-कूल और गहरे जल के निकट माना गया है जहाँ मगरमच्छ, सर्प और विषैले कीड़े सब मिलकर पापी को तड़पाते हैं।




