विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में गौहत्या को महापापों में सर्वोच्च स्थान दिया गया है। इसका कारण यह है कि गाय को सनातन धर्म में माता का दर्जा प्राप्त है और उसमें समस्त देवताओं का वास माना गया है।
गरुड़ पुराण के चतुर्थ अध्याय में भगवान विष्णु स्पष्ट कहते हैं कि 'ब्राह्मण-हत्यारे, सुरापान करने वाले, गोघाती, बाल हत्यारे, स्त्री की हत्या करने वाले और गर्भपात करने वाले — ये सभी विशेष रूप से वैतरणी में जाते हैं।' इसका अर्थ यह है कि गोघाती को वैतरणी की भीषण यातना अनिवार्य रूप से भोगनी पड़ती है।
वैतरणी में गोघाती के साथ यह होता है — वह रक्त, मवाद और मांस के कीचड़ से भरी उस नदी में डुबोया जाता है। बड़े-बड़े घड़ियाल और विषधर सर्प उसे नोचते हैं। वज्र जैसी चोंच वाले गिद्ध और कौए उस पर टूट पड़ते हैं। वह बार-बार डूबता और उभरता है, लेकिन कोई उसे बचाने वाला नहीं होता।
इसके अलावा गरुड़ पुराण में 36 नरकों में 'महावीचि' नरक गोघाती के लिए विशेष रूप से वर्णित है, जहाँ रक्त से भरे गड्ढे में उसे फेंका जाता है और बड़े-बड़े काँटे चुभाए जाते हैं।
गौहत्यारे का अगला जन्म भी कष्टमय होता है — गरुड़ पुराण के पाँचवें अध्याय में कहा गया है कि 'गाय की हत्या करने वाला मूर्ख और कुबड़ा होता है।'
इस पाप से मुक्ति के लिए ही हिंदू धर्म में मृत्यु से पूर्व वैतरणी गाय का दान करने का विधान है, ताकि वह गाय यमलोक के मार्ग में प्रकट हो और आत्मा को उस भीषण नदी से बचाए।





