विस्तृत उत्तर
विष मिला भोजन देकर किसी की हत्या करना गरुड़ पुराण में अत्यंत घोर पाप माना गया है। ऐसा व्यक्ति न केवल हत्या का पातकी है बल्कि विश्वासघात का भी दोषी है, क्योंकि वह अपने भोजन-दाता का धर्म तोड़ता है।
गरुड़ पुराण के अनुसार ऐसे पापी को 'रक्षकभोजन' नामक नरक में भेजा जाता है, जहाँ उसे दंड के रूप में विषयुक्त भोजन खिलाया जाता है। इस प्रकार वह उसी पीड़ा को भोगता है जो उसने अपने शिकार को दी थी — यह न्याय की भावना से किया गया दंड है।
इसके अतिरिक्त, गरुड़ पुराण के चतुर्थ अध्याय में जो पापी वैतरणी में गिरते हैं उनमें वे भी सम्मिलित हैं जो छलकपट और धोखे से दूसरों को कष्ट देते हैं। विष देकर हत्या करने वाले को वैतरणी की यातना भी भोगनी पड़ती है — उस रक्त-मवाद से भरी नदी में घड़ियाल और विषधर सर्प उसे काटते हैं। यहाँ एक विशेष न्याय यह है कि जिसने विष (जहर) दिया, उसे स्वयं विषधर प्राणियों से डसा जाना पड़ता है।
मृत्युलोक में अगले जन्म में भी इस पाप का प्रतिफल मिलता है। ऐसे पापी को नीच योनियों में जन्म लेना पड़ता है और जीवन में निरंतर रोग और कष्ट भोगने पड़ते हैं।
इस पाप की गंभीरता को देखते हुए गरुड़ पुराण में स्पष्ट निर्देश है कि किसी भी प्राणी को छल से, विष से या किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी से कष्ट नहीं देना चाहिए — क्योंकि ऐसे कर्मों का फल न केवल इस जन्म में बल्कि मृत्यु के बाद भी भोगना पड़ता है।



