विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के चतुर्थ अध्याय में भगवान विष्णु इसका स्पष्ट उत्तर देते हैं — 'सदा पापकर्मों में लगे हुए, शुभ कर्म से विमुख प्राणी एक नरक से दूसरे नरक को, एक दुःख के बाद दूसरे दुःख को तथा एक भय के बाद दूसरे भय को प्राप्त होते हैं।'
इसके पीछे कारण यह है कि जिस व्यक्ति ने जीवन में केवल पाप किए हैं, उसके पास पुण्य का लेश भी नहीं है। जब एक नरक की यातना पूरी होती है, तो उसके अन्य पाप उसे अगले नरक में खींच ले जाते हैं। प्रत्येक पाप के लिए एक अलग नरक और एक अलग यातना निर्धारित है — इसलिए अनेक पापों का बोझ उठाने वाले पापी को क्रमशः अनेक नरकों की यातना भोगनी पड़ती है।
धार्मिक जन यमराजपुर में तीन शुभ दिशाओं के द्वारों से प्रवेश करते हैं, जबकि पापी केवल दक्षिण-द्वार से। यह दक्षिण मार्ग ही महादुःखदायी है जहाँ वैतरणी नदी, असिपत्रवन और अनेक नरक-स्थान हैं।
गरुड़ पुराण में यह भी बताया गया है कि जो पापी यम के दरबार में अपना लेखा-जोखा सुनाए जाने के बाद नरक की ओर भेजा जाता है, वह सब नरकों से गुजरकर फिर वैतरणी में फेंका जाता है — 'सभी मार्गों को पार करके पापी यम के भवन में पहुँचते हैं और पुनः यम की आज्ञा से आकर दूत लोग उन्हें वैतरणी में फेंक देते हैं।'
इस प्रकार पापी के लिए नरक एक स्थायी स्थिति नहीं, बल्कि पाप-भोग की एक निरंतर प्रक्रिया है — जो तब तक चलती है जब तक उसके समस्त पापों का क्षय नहीं हो जाता।





