विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में ब्राह्मण होकर मद्यपान करने को महापापों में से एक माना गया है। इस पाप का कारण यह है कि ब्राह्मण की मर्यादा और पवित्रता की रक्षा करना उसका प्रथम धर्म है, और मद्यपान उस पवित्रता को पूर्णतः नष्ट कर देता है।
गरुड़ पुराण के चतुर्थ अध्याय में भगवान विष्णु स्पष्ट रूप से कहते हैं कि 'ब्राह्मण होकर मद्य पीने वाला, उच्छृंखल स्वभाव वाला और शास्त्र-अध्ययन से रहित ब्राह्मण वैतरणी में गिरता है।' अर्थात् यह पाप इतना गंभीर है कि ऐसे ब्राह्मण को विशेष रूप से वैतरणी नदी की यातना भोगनी पड़ती है।
इसके अतिरिक्त गरुड़ पुराण में 36 नरकों के वर्णन में 'विलेपक' नामक नरक का उल्लेख मिलता है जो विशेष रूप से मद्यपान करने वाले ब्राह्मणों के लिए बताया गया है। यहाँ आत्मा को जलती हुई आग में फेंका जाता है।
मृत्युलोक में इसके परिणाम भी बताए गए हैं। गरुड़ पुराण के पाँचवें अध्याय में कहा गया है कि 'मद्य पीने वाले के दाँत काले होते हैं' — अर्थात अगले जन्म में उसे यह पाप-चिह्न शरीर पर धारण करना पड़ता है। साथ ही सुरापान करने वाला भेड़िया, कुत्ता और सियार की नीच योनियों में जन्म लेता है।
इस प्रकार ब्राह्मण के लिए मद्यपान त्रिदंड पाप के समान है — पहले वैतरणी की यातना, फिर विशेष नरक, और उसके बाद पशु योनियों में भटकना।





