विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में अन्नदान और प्रेत के बीच के संबंध का अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रत्यक्ष वर्णन है।
पिंडदान = प्रेत का अन्न — दशगात्र में जो पिंड दिए जाते हैं वे अन्न से ही बने होते हैं। यह अन्न-पिंड प्रेत का भोजन है। गरुड़ पुराण के ग्यारहवें अध्याय में कहा गया है — 'अन्न, वस्त्र, जल, द्रव्य अथवा अन्य जो भी वस्तु प्रेत शब्द का उच्चारण करके मृत प्राणी को दी जाती है, उससे उसे अनन्त फल प्राप्त होता है।'
श्राद्ध का अन्न — ब्राह्मणों को कराया गया भोजन प्रेत और पितरों को तृप्त करता है। गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'यदि पितर देव योनि में हों तो श्राद्ध का भोजन अमृत रूप में, मनुष्य योनि में हों तो अन्न रूप में उन तक पहुँचता है।'
यमदूत का उलाहना — गरुड़ पुराण के तृतीय अध्याय में यमदूत पापियों से कहते हैं — 'सुलभ होने वाले भी जल और अन्न का दान कभी क्यों नहीं दिया?' जिसने अन्नदान नहीं किया, उसे यममार्ग पर भूखा तड़पना पड़ता है।
अन्नदान और प्रेत-मुक्ति — प्रेत को अन्न-पिंड और श्राद्ध-भोजन देने से उसे क्रमशः शरीर, शक्ति और अंततः मुक्ति मिलती है।





