विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में दान के फल को बढ़ाने वाले कारकों का विस्तृत वर्णन है।
पुण्यकाल में दान — गरुड़ पुराण के बारहवें अध्याय में — 'कार्तिक आदि शुभ महीनों में, सूर्य के उत्तरायण होने पर, शुक्लपक्ष की तिथियों में, सूर्य-चन्द्र के ग्रहणकाल में, पवित्र तीर्थ में' दिया गया दान विशेष फल देता है।
मृत्युकाल में — गरुड़ पुराण के आठवें अध्याय में — 'मृत्युकाल में दी गई एक हजार गाय के दान का फल स्वस्थावस्था में दी गई एक गाय के बराबर होता है।' मृत्युकाल में फल हजारगुना होता है।
तीर्थ में दान — 'तीर्थ में सत्पात्र को दी गई एक गाय का दान एक लाख गोदान के तुल्य होता है।'
सत्पात्र को दान — श्रेष्ठ, सदाचारी, जरूरतमंद व्यक्ति को दिया गया दान बहुगुना फल देता है।
श्रद्धापूर्वक दान — 'श्रद्धा से दिया गया दान' अधिक फलता है। बिना श्रद्धा के दिया गया दान राजसिक या तामसिक हो जाता है।
गुप्त दान — जो बिना दिखावे के किया जाए वह सात्विक दान है और अक्षय फल देता है।





