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दान का फल किसे मिलता है?

दान का फल दाता को (पाप-नाश, स्वर्ग), प्रेत-पितरों को (तृप्ति-मुक्ति) और तीनों लोकों को मिलता है।

संक्षिप्त उत्तर

दान का फल दाता को (पाप-नाश, स्वर्ग), प्रेत-पितरों को (तृप्ति-मुक्ति) और तीनों लोकों को मिलता है। 'भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्गलोक के निवासी सभी दान से संतुष्ट होते हैं।'

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विस्तृत उत्तर

गरुड़ पुराण में दान के फल के विषय में अत्यंत स्पष्ट और व्यापक वर्णन है।

दाता को — दान का प्राथमिक फल दाता (देने वाले) को मिलता है। उसके पापों का नाश होता है, यमदूत प्रसन्न होते हैं, यममार्ग सुगम होता है और स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

प्रेत और पितरों को — मृत्यु के बाद परिजनों द्वारा किया गया दान प्रेत और पितरों को सीधे पहुँचता है। गरुड़ पुराण में यह विश्वास है कि ब्राह्मण-भोजन, तर्पण और पिंडदान का सार प्रेत-पितरों तक पहुँचता है।

जिस परिवार के नाम पर दिया जाए — 'जो व्यक्ति किसी के नाम से दान करता है, उस दान का फल उस व्यक्ति को मिलता है।' यह गरुड़ पुराण का मृत आत्माओं के लिए दान का आधार है।

तीनों लोकों को — गरुड़ पुराण के आठवें अध्याय में कहा गया है — 'भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्गलोक के निवासी — मनुष्य, भूत-प्रेत तथा देवगण — दान से संतुष्ट होते हैं।' अर्थात् दान का फल सर्वव्यापी है।

दान और कर्म का संबंध — दान एक ऐसा कर्म है जिसका फल न केवल इस जन्म में बल्कि अगले जन्मों में भी मिलता है।

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