विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में यह बहुत विशिष्ट रूप से उल्लिखित है कि पापी जीव यमदूतों को देखकर मल-मूत्र त्याग देता है। यह एक आध्यात्मिक सत्य का शारीरिक प्रकाशन है।
आध्यात्मिक दृष्टि से — यह उस व्यक्ति की स्थिति है जिसके प्राण अधोमार्ग (उत्सर्जन अंग) से निकलते हैं। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि जो व्यक्ति स्वार्थी, लालची और विषयासक्त रहा हो, उसके प्राण उत्सर्जन अंगों से निकलते हैं। मल-मूत्र का अनैच्छिक त्याग इसी का बाह्य संकेत है।
भय की तीव्रता की दृष्टि से — यह इतनी तीव्र भय-प्रतिक्रिया है कि शरीर का समस्त नियंत्रण समाप्त हो जाता है। जिस प्रकार अत्यधिक भय में शरीर की स्वाभाविक प्रणालियाँ काम करना बंद कर देती हैं और अनैच्छिक क्रियाएँ होने लगती हैं, वही यहाँ होता है।
प्रतीकात्मक दृष्टि से — यह उस जीव की पतित अवस्था का चित्रण है। जो व्यक्ति जीवन में दूसरों को छोटा समझता था, अहंकार में रहता था — वह मृत्यु के समय सबसे अधिक हीन और निरुपाय स्थिति में होता है।
यह वर्णन इस सत्य को उजागर करता है कि पाप का अंत गर्व से नहीं, पतन से होता है।





