रामचरितमानस — बालकाण्ड'जसि रघुबीर ब्याह बिधि बरनी। सकल कुअँर ब्याहे तेहिं करनी' — इसका अर्थ?अर्थ — रामजी के विवाह की जो विधि बताई, उसी रीति से सब राजकुमार (भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न) भी विवाहे गये। चारों विवाह एक ही वेदविधि, एक मण्डप, एक अवसर पर। दहेज से मण्डप सोने-मणियों से भरा।#बालकाण्ड#चौपाई अर्थ#चारों विवाह
रामचरितमानस — बालकाण्डबारात अयोध्या से कब और कैसे चली?गुरु वसिष्ठजी की आज्ञा पर शुभ मुहूर्त में — 'सजहु बारात बजाइ निसाना।' हाथी-घोड़े-रथ सजाये, ब्राह्मण-मुनि-सेना साथ लिये। भव्य बारात अयोध्या से जनकपुर चली।#बालकाण्ड#बारात प्रस्थान#अयोध्या
रामचरितमानस — बालकाण्डअयोध्या वापसी पर नगरवासियों ने कैसे स्वागत किया?अपार आनन्द — नगर सजा, तोरण-पताकाएँ, मंगलगान। 'नगर नारि नर रूप निहारी। पाइ नयन फलु होहिं सुखारी' — बहुओं का रूप देख नेत्र-फल पाकर सुखी। ब्राह्मणों को दान, गरीबों को भोजन, अयोध्या उत्सवमय।#बालकाण्ड#अयोध्या वापसी#स्वागत
रामचरितमानस — बालकाण्डविवाह के बाद बारात अयोध्या कब और कैसे लौटी?विवाह-दहेज-विदाई के बाद भव्यता से अयोध्या लौटी। जनक ने अपार दहेज दिया। अयोध्या में अपार आनन्द — नगरवासी बहुओं का रूप देखकर सुखी हुए। बालकाण्ड का अन्तिम भाग — रामचरित महिमा।#बालकाण्ड#बारात वापसी#अयोध्या
रामचरितमानस — बालकाण्डसीता-राम विवाह विधिपूर्वक कैसे सम्पन्न हुआ?वेदमन्त्र विधि से — वसिष्ठजी-शतानन्दजी ने करवाया। सखियाँ सीताजी को सजाकर लायीं। जनक ने कुश हाथ में लेकर कन्यादान किया। पाणिग्रहण पर देवताओं ने नगाड़े बजाये, पुष्पवर्षा, मुनियों ने वेदमन्त्र उच्चारे।#बालकाण्ड#सीता राम विवाह#वेद मंत्र
रामचरितमानस — बालकाण्डजनकपुर में बारात का स्वागत कैसे हुआ?भव्य स्वागत — नगर सजा, तोरण-पताकाएँ। दशरथ-जनक का प्रेमपूर्ण मिलन। रामजी का विवाह-श्रृंगार — मोर-कण्ठ-सी कान्ति, पीताम्बर, विवाह आभूषण। सब मंगल सुहावने।#बालकाण्ड#बारात स्वागत#जनकपुर
रामचरितमानस — बालकाण्डदशरथ की बारात कैसी थी — जनकपुर कैसे पहुँची?अत्यन्त भव्य बारात — वसिष्ठजी, मुनि, ब्राह्मण, सेना, हाथी-घोड़े-रथ सजे-धजे। नगाड़े-मंगलगान। शिवजी ने देवताओं को समझाया, नन्दी आगे बढ़ाया। दशरथ प्रसन्न-पुलकित। शिवजी रामरूप देख-देख सजल नेत्र हुए।#बालकाण्ड#दशरथ बारात#जनकपुर
रामचरितमानस — बालकाण्डपरशुरामजी ने अन्त में श्रीरामजी को कैसे पहचाना?रामजी के मृदु-गूढ़ वचनों से बुद्धि के परदे खुले। फिर रामजी ने विष्णु धनुष लेकर खींचा — तब परशुरामजी ने प्रभाव जाना। पुलकित होकर हाथ जोड़कर बोले — 'जय रघुबंस बनज बन भानू!' — परब्रह्म पहचानकर प्रणाम किया।#बालकाण्ड#परशुराम#राम पहचान
रामचरितमानस — बालकाण्डश्रीरामजी ने शिव धनुष कैसे उठाया?अत्यन्त सहजता से — जबकि दस हज़ार राजा हिला नहीं सके। सहज भाव से उठाया, प्रत्यंचा चढ़ाई, खींचा — बीच से टूट गया। 'संकर चापु जहाजु सागरु रघुबर बाहुबलु' — धनुष = जहाज, राम बाहुबल = समुद्र।#बालकाण्ड#धनुष उठाया#सहज
रामचरितमानस — बालकाण्डजनकपुर में राजा जनक ने विश्वामित्रजी का कैसे स्वागत किया?जनक ने ब्राह्मणों के साथ आकर दण्डवत किया, आसन दिया, चरण पखारे, भोजन करवाया। रामजी को देखकर मुग्ध हो गये — 'जनु चकोर पूरन ससि लोभा' — जैसे चकोर पूर्ण चन्द्रमा देखकर लुभा जाये।#बालकाण्ड#जनक#विश्वामित्र स्वागत
रामचरितमानस — बालकाण्डअहल्या का उद्धार कैसे हुआ?श्रीरामजी के चरण-स्पर्श से — 'परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही' — पवित्र चरणों का स्पर्श पाते ही शिला से तपोमूर्ति अहल्या प्रकट हुईं। स्तुति करके आनन्दपूर्वक पतिलोक गयीं।#बालकाण्ड#अहल्या उद्धार#चरण स्पर्श
रामचरितमानस — बालकाण्डश्रीरामजी ने ताड़का का वध कैसे किया?एक ही बाण से — 'एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा॥' — एक बाण से प्राण हरे और दीन जानकर निजपद (मुक्ति) दिया। भगवान शत्रु को मारकर भी कल्याण करते हैं।#बालकाण्ड#ताड़का वध#एक बाण
रामचरितमानस — बालकाण्डवसिष्ठजी ने राजा दशरथ को कैसे समझाया?वसिष्ठजी ने बहुत प्रकार से समझाया — राजा का सन्देह नष्ट हुआ। दशरथ ने दोनों पुत्रों को हृदय से लगाकर शिक्षा दी और विश्वामित्रजी को सौंपा — 'सौंपे भूप रिषिहि सुत बहुबिधि देइ असीस।'#बालकाण्ड#वसिष्ठ#दशरथ समझाना
रामचरितमानस — बालकाण्डगुरु वसिष्ठजी ने चारों पुत्रों का नाम कैसे रखा — क्या अर्थ बताया?राम — सबके हृदय में रमण करने वाले, आनन्दस्वरूप। भरत — विश्व का भरण करने वाले। लक्ष्मण — लक्ष्मी के मनरूप, शेषजी के अवतार। शत्रुघ्न — शत्रुओं का नाश करने वाले। गुरु वसिष्ठजी ने गुण-अर्थ अनुसार नाम रखे।#बालकाण्ड#वसिष्ठ#नामकरण अर्थ
रामचरितमानस — बालकाण्डप्रतापभानु को ब्राह्मणों का शाप कैसे लगा?कपटमुनि ने भोजन में माँस मिलाया। आकाशवाणी ने ब्राह्मणों को चेतावनी दी। क्रोधित ब्राह्मणों ने बिना विचारे शाप दिया — 'जाइ निसाचर होहु नृप मूढ़ सहित परिवार' — मूर्ख राजा, परिवारसहित जाकर राक्षस हो जा।#बालकाण्ड#ब्राह्मण शाप#प्रतापभानु
रामचरितमानस — बालकाण्डभगवान ने नारदजी के शाप को कैसे स्वीकार किया?भगवान ने शाप प्रसन्नतापूर्वक सिर पर चढ़ाया — यह उनकी लीला-योजना का अंश था। नारदजी के पश्चाताप पर कहा — सब मेरी इच्छा से हुआ, चिन्ता मत करो। शंकर शतनाम जपो, शान्ति मिलेगी। 'कोउ नहीं सिव समान प्रिय मोरें' — शिवजी के समान मुझे कोई प्रिय नहीं।#बालकाण्ड#भगवान#शाप स्वीकार
रामचरितमानस — बालकाण्डनारदजी ने माता मैना को कैसे समझाया?पहले पार्वतीजी ने माता को समझाया — 'जो विधाता रच दे वह नहीं टलता, दोष किसी को मत दो।' फिर नारदजी ने आकर सबको समझाया कि शिवजी स्वयं भगवान हैं। शिवजी ने सुन्दर रूप धारण किया तो सब प्रसन्न हुए।#बालकाण्ड#नारद#मैना
रामचरितमानस — बालकाण्डशिवजी ने कामदेव को कैसे भस्म किया?कामदेव ने आम के पेड़ से पाँच बाण शिवजी पर छोड़े, समाधि टूटी। शिवजी ने तीसरा नेत्र खोला — 'तब सिवँ तीसर नयन उघारा। चितवत कामु भयउ जरि छारा॥' — देखते ही कामदेव जलकर भस्म हो गया। तीनों लोक काँप उठे।#बालकाण्ड#कामदहन#तीसरा नेत्र
रामचरितमानस — बालकाण्डपार्वतीजी ने 'अपर्णा' नाम कैसे पाया?'अपर्णा' = अ (बिना) + पर्णा (पत्ते) = पत्तों के बिना रहने वाली। जब पार्वतीजी ने तपस्या में सूखे पत्ते खाना भी छोड़ दिया, तब उनका नाम 'अपर्णा' पड़ा। चौपाई — 'पुनि परिहरे सुखानेउ परना। उमहि नामु तब भयउ अपरना॥'#बालकाण्ड#अपर्णा#पार्वती
रामचरितमानस — बालकाण्डशिवजी ने श्रीरामजी को देखकर कैसे प्रणाम किया?शिवजी ने 'सच्चिदानन्द परमधाम' कहकर हृदय से प्रणाम किया। सतीजी से कहा — 'सोइ मम इष्टदेव रघुबीरा' — ये वही मेरे इष्टदेव श्रीरघुवीर हैं जिनकी कथा अगस्त्य ऋषि ने गाई और जिनकी सेवा ज्ञानी मुनि सदा करते हैं।#बालकाण्ड#शिवजी प्रणाम#सीय राममय
रामचरितमानस — बालकाण्डतुलसीदासजी ने राम नाम को निर्गुण और सगुण दोनों से कैसे बड़ा बताया?तुलसीदासजी ने कहा कि राम नाम निर्गुण और सगुण दोनों के बीच 'सुन्दर साक्षी' और 'चतुर दुभाषिया' है — दोनों का ज्ञान कराने वाला। रूप नाम के अधीन है, नाम के बिना रूप का ज्ञान नहीं हो सकता।#बालकाण्ड#नाम महिमा#निर्गुण सगुण
रामचरितमानस — बालकाण्डदुष्ट व्यक्ति सत्संग पाकर कैसे सुधरता है — तुलसीदासजी ने कौन सा दृष्टान्त दिया?पारस पत्थर और लोहे का दृष्टान्त दिया — जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है, वैसे ही सत्संग से दुष्ट भी सुधर जाता है। उल्टा नहीं होता — सज्जन कुसंगति में भी साँप की मणि समान अपने गुण रखता है।#बालकाण्ड#सत्संग#पारस