विस्तृत उत्तर
जब राजा दशरथ ने राम को देने से मना किया तो विश्वामित्रजी के मन में हर्ष हुआ (क्योंकि राजा का पुत्र-प्रेम देखकर प्रसन्न हुए)। तब गुरु वसिष्ठजी ने राजा को बहुत प्रकारसे समझाया।
चौपाई — 'सुनि नृप गिरा प्रेम रस सानी। हृदयँ हरष मानी मुनि ग्यानी। तब बसिष्ठ बहुबिधि समुझावा। नृप संदेह नास कहँ पावा॥'
अर्थ — प्रेम-रसमें सनी हुई राजाकी वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि विश्वामित्रजीने हृदयमें बड़ा हर्ष माना। तब वसिष्ठजीने राजाको बहुत प्रकारसे समझाया, जिससे राजाका सन्देह नाशको प्राप्त हुआ।
वसिष्ठजी ने समझाया कि विश्वामित्रजी महान ऋषि हैं, राम-लक्ष्मण उनके साथ सुरक्षित रहेंगे, और यह सब भगवान की लीला है। इससे धर्म, यश और कल्याण होगा।
समझाने के बाद दशरथ ने दोनों पुत्रों को बड़े आदर से बुलाया, हृदय से लगाया, शिक्षा दी और विश्वामित्रजी को सौंप दिया।



