विस्तृत उत्तर
जनकपुर में बारात का भव्य स्वागत हुआ। राजा जनक ने सम्पूर्ण नगर सजवाया, तोरण-पताकाएँ लगवाईं और अगवानी (स्वागत) के लिये भव्य व्यवस्था की।
दशरथ और जनक का मिलन अत्यन्त प्रेमपूर्ण हुआ। दोनों राजाओं ने एक-दूसरे का सम्मान किया। बारात के लोगों को उत्तम आवास, भोजन और सेवा प्रदान की गयी।
श्रीरामजी का विवाह-श्रृंगार अत्यन्त सुन्दर था — 'केकि कंठ दुति स्यामल अंगा। तड़ित बिनिंदक बसन सुरंगा। ब्याह बिभूषन बिबिध बनाए। मंगल सब सब भाँति सुहाए' — मोरके कण्ठकी-सी कान्तिवाला श्याम शरीर, बिजलीको तिरस्कार करनेवाले सुन्दर पीले वस्त्र, विवाहके सब प्रकारके आभूषण शरीरपर सजाये।





