विस्तृत उत्तर
जब माता मैना विलाप कर रही थीं, तब पार्वतीजी ने स्वयं माता को विवेकयुक्त कोमल वाणी से समझाया। इसके बाद नारदजी भी आये और उन्होंने सबको समझाया।
पार्वतीजी ने माता से कहा — 'अस बिचारि सोचहि मति माता। सो न टरइ जो रचइ बिधाता। करम लिखा जौं बाउर नाहू। तौ कत दोसु लगाइअ काहू॥'
अर्थ — हे माता! ऐसा विचारकर तुम सोच मत करो। जो विधाता रच देते हैं, वह टलता नहीं। जो मेरे भाग्यमें बावला ही पति लिखा है तो किसीको क्यों दोष लगाया जाय?
इसके बाद नारदजी आये और उन्होंने मैना को समझाया कि शिवजी स्वयं भगवान हैं, उनका यह रूप उनकी लीला है। शिवजी ने अपना सुन्दर रूप धारण किया तो सब प्रसन्न हो गये।





