विस्तृत उत्तर
शिवजी ने श्रीरामजी को हृदय से प्रणाम किया और 'सच्चिदानन्द परधामा' कहा। इसके बाद एक अत्यन्त प्रसिद्ध दोहा आता है जिसमें शिवजी ने सम्पूर्ण जगत को सीताराममय जानकर प्रणाम किया।
शिवजी ने मन-ही-मन कहा और हाथ जोड़कर प्रणाम किया। आगे वे सतीजी को समझाते हुए कहते हैं — 'जासु कथा कुम्भज रिषि गाई। भगति जासु मैं मुनिहि सुनाई। सोइ मम इष्टदेव रघुबीरा। सेवत जाहि सदा मुनि धीरा॥'
अर्थ — जिनकी कथाका अगस्त्य ऋषिने गान किया और जिनकी भक्ति मैंने मुनिको सुनायी, ये वही मेरे इष्टदेव श्रीरघुवीरजी हैं, जिनकी सेवा ज्ञानी मुनि सदा किया करते हैं।
इस प्रकार शिवजी ने स्पष्ट कहा कि ये साक्षात् परब्रह्म श्रीराम हैं, मेरे इष्टदेव हैं।





