विस्तृत उत्तर
अहल्या का उद्धार श्रीरामजी के पवित्र चरणों के स्पर्श से हुआ। मार्ग में एक आश्रम दिखा जहाँ कोई पशु-पक्षी नहीं था, केवल एक शिला (पत्थर) पड़ी थी। विश्वामित्रजी ने रामजी को सब कथा बताई।
छन्द — 'परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही। देखत रघुनायक जन सुखदायक सनमुख होइ कर जोरि रही॥'
अर्थ — श्रीरामजीके पवित्र और शोकको नाश करनेवाले चरणोंका स्पर्श पाते ही सचमुच वह तपोमूर्ति अहल्या प्रकट हो गयी। भक्तोंको सुख देनेवाले श्रीरघुनाथजीको देखकर वह हाथ जोड़कर सामने खड़ी रह गयी।
अहल्या ने अत्यन्त प्रेम से भगवान के चरणों में गिरकर स्तुति की और कहा — मुनि (गौतम) ने जो शाप दिया, सो मैंने अत्यन्त भला ही किया (अनुग्रह) माना, क्योंकि जिसके कारण मैंने संसार से छुड़ानेवाले श्रीहरि को नेत्र भरकर देखा।
फिर अहल्या आनन्द से भरी हुई पतिलोक (गौतम ऋषि के पास) को चली गयी।





