विस्तृत उत्तर
राजा जनक ने विश्वामित्रजी का अत्यन्त आदरपूर्वक स्वागत किया। जब जनक को विश्वामित्रजी के आगमन का समाचार मिला तो वे ब्राह्मणों के समाज को साथ लेकर मिलने गये, दण्डवत करके मुनि का सम्मान किया और अपने आसन पर बैठाया।
श्रीरामजी और लक्ष्मणजी को देखकर राजा जनक मुग्ध हो गये — 'राम देखि मुनि देह बिसारी। भए मगन देखत मुख सोभा। जनु चकोर पूरन ससि लोभा' — श्रीरामचन्द्रजीको देखकर मुनि (जनक) अपनी देहकी सुधि भूल गये, मुखकी शोभा देखते ही ऐसे मग्न हो गये, मानो चकोर पूर्ण चन्द्रमाको देखकर लुभा गया हो।
फिर जनक ने राजा को चरणों में सुत चारों को डाला (प्रणाम कराया) और अनेक प्रकार के भोजन करवाये।



