विस्तृत उत्तर
दशरथ की बारात अत्यन्त भव्य और शोभायमान थी। अयोध्या से जनकपुर तक बारात ने भव्य यात्रा की।
बारात में दशरथ के साथ गुरु वसिष्ठजी, अनेक मुनि, ब्राह्मण, सामन्त, सेना और सम्पूर्ण परिवार था। हाथी, घोड़े, रथ, पालकियाँ — सब सजे-धजे थे। नगाड़े बज रहे थे, मंगलगान हो रहा था।
शिवजी ने देवताओं को समझाया और अपने श्रेष्ठ बैल नन्दी को आगे बढ़ाया। देवताओंने देखा कि दशरथजी मनमें बड़े ही प्रसन्न और शरीरसे पुलकित हुए चले जा रहे हैं।
दोहा — 'राम रूपु नख सिख सुभग बारहिं बार निहारि। पुलक गात लोचन सजल उमा समेत पुरारि॥' — रामजी के नखशिख सुन्दर रूपको बार-बार देखते हुए श्रीशिवजी पार्वतीजीसहित पुलकित और सजल नेत्र हो गये।




