विस्तृत उत्तर
यह जनकपुर की स्त्रियों का संवाद है जब उन्होंने श्रीरामजी को देखकर सीताजी से उनके विवाह की कामना की।
पूरा प्रसंग — 'कोउ कह जौं भल अहइ बिधाता। सब कहँ सुनिअ उचित फलदाता। तौ जानकिहि मिलिहि बरु एहू। नाहिन आलि इहाँ संदेहू॥'
अर्थ — कोई कहती है — यदि विधाता भले हैं और सुना जाता है कि वे सबको उचित फल देते हैं, तो जानकीजीको यही वर मिलेगा। हे सखी! इसमें सन्देह नहीं है।
आगे — 'जौं बिधि बस अस बनै सँजोगू। तौ कृतकृत्य होइ सब लोगू। सखि हमरें आरति अति ताते। कबहुँक ए आवहिं एहि नातें॥'
अर्थ — जो दैवयोगसे ऐसा संयोग बन जाय, तो हम सब लोग कृतार्थ हो जायँ। हे सखी! मेरे तो इसीसे इतनी अधिक आतुरता हो रही है कि ये कभी ये इसी नातेसे (ससुराल) यहाँ आवें।
तात्पर्य — जनकपुर की स्त्रियों ने रामजी को जानकी का योग्य वर माना और उनके विवाह की हार्दिक कामना की।

