विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में मृत्यु के समय भय का वर्णन इस प्रकार किया गया है — यह पूर्णतः व्यक्ति के जीवन और कर्मों पर निर्भर करता है। जो व्यक्ति जीवन भर धर्म के मार्ग पर चला हो, ईश्वर का स्मरण किया हो और पुण्यकर्म किए हों, उसे मृत्यु के समय कोई विशेष भय नहीं होता। उसे दिव्य अनुभव होते हैं और अपने कर्मों की स्मृति से उसे शांति मिलती है।
दूसरी ओर, जो व्यक्ति पापकर्मों में लिप्त रहा हो, उसे मृत्यु के समय यमदूत दिखाई देते हैं जो अत्यंत भयावह रूप में होते हैं। उन्हें देखकर ऐसे व्यक्ति भय से काँप उठते हैं, मल-मूत्र त्याग देते हैं और आत्मा नीचे की ओर खिसकती है।
कठोपनिषद में नचिकेता का प्रसंग इसका उदाहरण है — जो व्यक्ति मृत्यु के रहस्य को जीते-जी समझ लेता है, उसे मृत्यु से भय नहीं रहता। ज्ञानी और भक्त साधक के लिए मृत्यु एक उत्सव है — वह जानता है कि वह एक पुराना वस्त्र उतारकर नया धारण करने जा रहा है।
सारांशतः, मृत्यु का भय अज्ञान और पापकर्मों का परिणाम है। जीवन भर का ज्ञान, भक्ति और सत्कर्म इस भय को समाप्त करते हैं।





