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विस्तृत उत्तर
नहीं, वैष्णवास्त्र का वार कभी भी निष्फल नहीं होता था। लक्ष्य का भेद होना सुनिश्चित था। यह दिव्यास्त्र प्रत्येक जीवित प्राणी का संहार करने में सक्षम था और लक्ष्य चाहे किसी भी प्रकृति का हो वैष्णवास्त्र उसे पूर्ण रूप से विनष्ट कर सकता था। केवल दो विशेष परिस्थितियों में यह अपना प्रभाव नहीं दिखाता था — पहला, जब सामने वाला पूर्ण समर्पण करके सभी शस्त्र त्याग दे, और दूसरा, जब लक्ष्य स्वयं विष्णु का अंश हो जैसे लक्ष्मण जी के मामले में हुआ।
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