विस्तृत उत्तर
जल में स्मृति (Memory) और ऊर्जा को सोखने की अद्भुत क्षमता होती है। जब मंत्रों की ध्वनि तरंगें जल से टकराती हैं, तो जल के सूक्ष्म अणु (Molecules) उस मंत्र की सकारात्मक ऊर्जा को अपने भीतर समाहित कर लेते हैं। इसी प्रक्रिया को जल अभिमंत्रित करना कहते हैं।
इसकी विधि अत्यंत सरल है: तांबे या पीतल के पात्र (ग्लास या लोटे) में शुद्ध जल लें। दाहिने हाथ (Right hand) की हथेली से उस पात्र को ऊपर से ढक लें या उसे हाथों में पकड़कर रखें। जल पर अपनी दृष्टि एकाग्र करें और 11, 21 या 108 बार गायत्री मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र, या अपने इष्ट देव के बीज मंत्र का पूर्ण श्रद्धा से उच्चारण करें। इसके बाद उस जल में तीन बार फूंक मारें। यह जल अब सामान्य जल नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली 'औषधि' और 'प्रसाद' बन गया है, जिसे रोगी को पिलाने से उसके रोग और नकारात्मकता नष्ट हो जाती है।





