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विस्तृत उत्तर
मत्स्य पुराण का अभेद-दर्शन श्लोक:
यथा भेदं न पश्यामि शिवविष्ण्वर्कपद्मजान्। तथा ममास्तु विश्वात्मा शंकर: शंकर: सदा॥
अर्थ: जिस प्रकार मैं शिव, विष्णु, सूर्य (अर्क) और ब्रह्मा (पद्मज) में कोई भेद (अंतर) नहीं देखता हूँ, उसी प्रकार विश्व की अंतरात्मा स्वरूप भगवान शंकर (कल्याण करने वाले) सदा मेरे लिए कल्याणकारी हों।
शंकर' शब्द का यहाँ व्युत्पत्तिपरक अर्थ है 'शं कल्याणं करोति' अर्थात जो कल्याण करे।
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